चंडी पाठ में कुल 700 श्लोक हैं. दुर्गा सप्तशती में अध्याय एक से तेरह तक 3 चरित्र विभाग हैं. ये श्लोक खुद में ऐसे वैज्ञानिक सूत्र हैं जो अपने शब्दों के संयोजन की ध्वनि से शरीर में रसायनिक प्रकिया के ज़रिये इंसान की आंतरिक शक्ति को बढ़ाते हैं. खासकर नवरात्रि काल में इसका विशेष महत्व होता है.
चंडी माता की उत्पत्ति कैसे हुई?
चंडी देवी विश्व के पौराणिक मन्दिरों में से एक है। दुष्टों के संहार के लिए महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती इन तीनों देवियों ने मां चंडी का रूप लिया था। देवताओं पर अत्याचार के बाद जब मां चंडी ने दुष्टों का संहार किया तो उसके बाद मां चंडी ने हरिद्वार में ही निवास किया।
चंडी का मंत्र
हर जगह से लाभ और लाभ के लिए श्री मंगल चंडी मंत्र -
॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं सर्व पूज्य देवी मंगल चंडिके ऐ क्रम फट् स्वाः ॥
ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
किवदंती के अनुसार कहा जाता है कि पांच पांडव अपने 12 वर्ष के वनवास के दौरान घूमते हुए यहां पर आए थे और चंडी माता का मंदिर देखा यहां पर ठहराव किया। कहा जाता है कि यहां पर अर्जुन ने पेड़ की शाखा पर बैठकर मां की तपस्या की थी, जिससे खुश होकर माता चंडी ने अजुर्न को तेजस्वी तलवार व जीत का वरदान दिया था।
चंडी माता किसका रूप है?
चंडी देवी को काली देवी की तरह माना जाता है और प्रायः इनके उग्र रूप की पूजा की जाती है. अश्विन और चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवरात्रि में चंडी पूजा विशेष समारोह के साथ मनाया जाता है. पूजा के लिए ब्राह्मण की ओर से मंदिर के मध्य स्थान को गोबर और मिट्टी से लीप कर मिट्टी के एक कलश की स्थापना की जाती है.


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