Tuesday, 12 September 2023

Mahakaleshwar Mantra | Call Now+919118281718

 जय महाकालेश्वर जी की

महाकालेश्वर के दर्शन करने से क्या लाभ होता है?
महाकाल का वास होने से पुरातन साहित्य में उज्जैन को महाकालपुरम भी कहा गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो थोड़े जल से भी प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की हर इच्छा पूरी कर देते हैं। उसी प्रकार जो भी भक्त महाकालेश्वर के दर्शन कर अपनी मनोकामना करता है, उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है।
महाकाल का मूल प्रिय मंत्र
ओम नमो नीलकण्ठाय नम:।। इस मंत्र का जाप नियमित रूप से करने से रोग, दोष तथा सभी सकंट समाप्त हो जाते हैं. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
महाकाल का मूल मंत्र क्या है?
शिवजी की आराधना का मूल मंत्र तो ऊं नम: शिवाय ही है लेकिन इस मंत्र के अतिरिक्त भी कुछ मंत्र हैं जो महादेव को प्रिय हैं. नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय| नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥
महाकालेश्वर क्यों प्रसिद्ध है?


यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है।
महाकाल का दिन कौन सा है?
रविवार को भस्मआरती के दौरान महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग। देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख भगवान महाकाल की भस्म आरती की परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है। भगवान महाकाल के दिन की शुरुआत सुबह 4 बजे इसी आरती से होती है।

उज्जैन महाकाल मंदिर के बारे में क्या खास है?
महाकालेश्वर का मंदिर, इसका शिखर आसमान में चढ़ता है, आकाश के खिलाफ एक भव्य अग्रभाग, अपनी भव्यता के साथ आदिकालीन विस्मय और श्रद्धा को उजागर करता है। महाकाल शहर और उसके लोगों के जीवन पर हावी है, यहां तक ​​कि आधुनिक व्यस्तताओं के व्यस्त दिनचर्या के बीच भी, और पिछली परंपराओं के साथ एक अटूट लिंक प्रदान करता है।


Kashi Vishwanath | Call Now+919118281718

 


बाबा विश्वनाथ के 'महाप्रसाद' में चमत्कार होता है. बाबा न सिर्फ यहां आने वालों के सभी दुख हर लेते हैं बल्कि लोगों की किस्मत भी बदल देते हैं. पहले बाबा के मंदिर में चढ़ने वाला प्रसाद अलग अलग जगह से आता था.

काशी शिव को प्रिय क्यों है?
शिव की नगरी काशी के कण-कण में भगवान भोलेनाथ का वास है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काशी भगवान शिव के त्रिशुल पर बसी हुई है। पूरे बनारस में आपको भगवान शिव के जितने मंदिर मिलेंगे, उतने मंदिर संभवतः पूरी दुनिया में नहीं मिलेंगे। कहा भी जाता है कि काशी भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।
आनन्दकन्दं हतपापवृन्दम्। श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥ अर्थ - जो भगवान् शंकर आनन्दवन काशी क्षेत्र में आनन्दपूर्वक निवास करते हैं, जो परमानन्द के निधान एवं आदिकारण हैं, और जो पाप समूह का नाश करने वाले हैं, मैं ऐसे अनाथों के नाथ काशीपति श्री विश्वनाथ की शरण में जाता हूँ।
भगवान शिव को कौन सा भोजन पसंद है?
जानिए भगवान शिव को कौन सा प्रसाद ...
भगवान शिव को भांग और पंचामृत का नैवेद्य पसंद होता है। इसके अलावा उन्हें रेवड़ी, चिरौंजी और मिश्री भी चढ़ाई जाती है। सावन के महीने में भोले बाबा का व्रत रखकर उन्हें गुड़ चना और चिरौंजी का भोग लगाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
काशी में क्या दान करना चाहिए?
काशी में मां गंगा और बाबा विश्वनाथ साक्षात विराजमान हैं। पितरों की कामना से दान में गेंहू, चावल, अन्न, बर्तन फल का दान दिया जाता है। - पितरों के नाम से गाय को घास देना चाहिए।
काशी विश्वनाथ की क्या मान्यता है?
जानें काशी विश्वनाथ
मंदिर के प्रमुख देवता श्री विश्वनाथ हैं जिसका अर्थ है ब्रह्मांड के भगवान ऐसी मान्यता है कि अगर भक्त एक बार इस मंदिर के दर्शन और पवित्र गंगा में स्नान कर ले तो मोक्ष की प्राप्ति होती है. काशी विश्वनाथ मंदिर अनादि काल से शैव दर्शन का केंद्र रहा है

काशी विश्वनाथ की महिमा है?
बाबा विश्वनाथ भक्तों के सभी कष्ट हरने वाले माने जाते हैं। कहा जाता है कि बाबा विश्वनाथ दर्शन मात्र से मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है। यदि कोई भक्त बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाता है, तो उसे जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही बाबा का आशीर्वाद अपने भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार खोल देता है।

Saturday, 2 September 2023

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बजरंग बाण के नियमित पाठ करने से कुंडली में ग्रह दोष समाप्त होते हैं। विवाह में आने वाले बाधाएं दूर होती हैं। गंभीर बीमारियों होने की दशा में इसमें राहत या निजात मिलती है। व्यक्ति को कार्यक्षेत्र में अच्छी सफलताएं प्राप्त होने लगती हैं।

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार सभी देवी-देवताओं में रामभक्त और अंजनिपुत्र वीर बजरंगबली ऐसे देवता हैं, जो अपने भक्तों के कष्टों, परेशानियां, भय और रोगों से मुक्ति दिलाते हैं। भगवान हनुमान जल्दी ही प्रसन्न होने वाले देव हैं और आज भी सशरीर इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं। भगवान हनुमान चिरंजीवी हैं। भक्त हनुमानजी को प्रसन्न करने और अपनी हर तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए उनकी विधिवत पूजा-उपासना करते हैं। सभी इच्छाओं की पूर्ति और भय से मुक्ति के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करने के साथ बजरंग बाण का पाठ भी किया जाता है। हनुमान चालीसा के अलावा बजरंग बाण के पाठ को करने से हनुमानजी की आराधना कर उनका आशीर्वाद पाने का सबसे अचूक उपाय माना जाता है। बजरंग बाण के नियमित पाठ करने से कुंडली में ग्रह दोष समाप्त होते हैं। विवाह में आने वाले बाधाएं दूर होती हैं। गंभीर बीमारियों होने की दशा में इसमें राहत या निजात मिलती है। व्यक्ति को कार्यक्षेत्र में अच्छी सफलताएं प्राप्त होने लगती हैं। समाज में मान-सम्मान की वृद्धि होती है और वास्तुदोष खत्म हो जाते हैं।

बजरंग बाण
" दोहा "
"निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।"
"तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥"
"चौपाई"
जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी।।
जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महासुख दीजै।।
जैसे कूदि सिन्धु महि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।
आगे जाई लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा।।
बाग़ उजारि सिन्धु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा।।
अक्षयकुमार को मारि संहारा। लूम लपेट लंक को जारा।।
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर में भई।।
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु उर अन्तर्यामी।।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होय दुख हरहु निपाता।।
जै गिरिधर जै जै सुखसागर। सुर समूह समरथ भटनागर।।
ॐ हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहिंं मारु बज्र की कीले।।
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो।।
ऊँकार हुंकार प्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ऊँ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा।।
सत्य होहु हरि शपथ पाय के। रामदूत धरु मारु जाय के।।
जय जय जय हनुमन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा।।
वन उपवन, मग गिरिगृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।
पांय परों कर ज़ोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।।
जय अंजनिकुमार बलवन्ता। शंकरसुवन वीर हनुमन्ता।।
बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक।।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बेताल काल मारी मर।।
इन्हें मारु तोहिं शपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की।।
जनकसुता हरिदास कहावौ। ताकी शपथ विलम्ब न लावो।।
जय जय जय धुनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा।।
चरण शरण कर ज़ोरि मनावौ। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।।
उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई। पांय परों कर ज़ोरि मनाई।।
ॐ चं चं चं चं चपत चलंता। ऊँ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता।।
ऊँ हँ हँ हांक देत कपि चंचल। ऊँ सं सं सहमि पराने खल दल।।
अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनन्द हमारो।।
यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिर कौन उबारै।।
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।
यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत प्रेत सब काँपै।।
धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा।।
"दोहा"
" प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान। "
" तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान।। "

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 क्या होता है पितृदोष

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार मृत्यु लोक पर हमारे पूर्वजों की आत्माएं अपने परिवार के सदस्यों को देखती रहती हैं. जो लोग अपने पूर्वजों का अनादर करते हैं, या उन्हें कष्ट देते हैं. इससे दुखी दिवंगत आत्माएं उन्हें शाप देती हैं इसी शाप को पितृ दोष माना जाता है.

पितृ दोष के लक्षण क्या होते हैं?
घर में हमेशा किसी का बीमार रहना, मान-सम्मान की हानि, पिता से विवाद, बहुत मेहनत के बाद भी सफलता न मिलना या फिर बने बनाए काम का बिगड़ जाना. यह लक्षण कुंडली में सूर्य के कमजोर होने का संकेत हैं. यह चीजें इस तरफ भी इशारा करती हैं कि आपके कुंडली में पितृ दोष है. ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष को एक श्राप की तरह माना जाता है.

पितृ दोष कितने वर्ष तक रहता है?
पितृदोष का भयानक असर, जानिये
विद्वानों ने पितर दोष का संबंध बृहस्पति (गुरु) से बताया है। अगर गुरु ग्रह पर दो बुरे ग्रहों का असर हो तथा गुरु 4-8-12वें भाव में हो या नीच राशि में हो तथा अंशों द्वारा निर्धन हो तो यह दोष पूर्ण रूप से घटता है और यह पितर दोष पिछले पूर्वज (बाप दादा परदादा) से चला आता है, जो सात पीढ़ियों तक चलता रहता है।


क्या हैं पितृ दोष से बचने के उपाय
अगर आपकी कुंडली में पितृदोष है, तो पितरों की फोटो दक्षिण दिशा की ओर लगाएं। इसके साथ ही रोजाना माला चढ़ाकर उनका स्मरण करना चाहिए। पीपल के पेड़ पर दोपहर के समय जल चढ़ाएं। इसके साथ ही फूल, अक्षत, दूध, गंगाजल और काले तिल भी चढ़ाने चाहिए और पितरों का स्मरण करना चाहिए।

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वट वृक्ष को जल देने से . श्राद्ध के दौरान 15 दिनों तक या उनकी मृत्यु की तिथि पर अपने पितरों को जल अर्पित करने से। प्रत्येक अमावस्या पर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। प्रत्येक "अमावस्या" और "पूर्णिमा" पर किसी मंदिर या अन्य धार्मिक स्थानों पर खाद्य पदार्थ दान करने से।

-पीपल के पेड़ पर जलाएं दीपक
ऐसा माना जाता है कि पीपल के पेड़ पर देवी-देवताओं के अलावा पितरों का भी वास होता है. ऐसे में यदि कोई व्यक्ति पीपल में जल देकर रोजाना घी या सरसो के तेल का दीपक पीपल के नीचे जलाए तो पितृ प्रसन्न होते हैं और ऐसे व्यक्तियों को पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है.
इस साल पितृ पक्ष 29 सितंबर 2023 से शुरू हो रहे हैं इसका समापन 14 अक्टूबर 2023 को होगा. पितृ पक्ष हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से अश्विन माह की अमावस्या तक चलता है, इसे सर्व पितृ अमावस्या और महालय अमावस्या कहते हैं.
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पितर दोष का अर्थ है पूर्वज श्रेणी के लोग जैसे माता, पिता, गुरु, चाचा, ताऊ, मामा, फूफा, मौसा आदि। पितृदोष का मतलब है पितर माता, पिता, गुरु के द्वारा रुष्ट होने पर या गलत व्यवहार करने पर अपने पुत्र, पुत्री, शिष्य को पितृ शाप मिलता है। वहीं आशीर्वाद से हम प्रगति करते हैं । जब पितृ दोष हो तब जीवन अतृप्त ही रहता है।

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ओम गं गणपतये नमः मंत्र से क्या होता है?

ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र के अनगिनत फायदे हैं।
ॐ गं गणपतये नमः मंत्र बहुत शक्तिशाली होता है और इसके कई फायदे हैं। कहा जाता है कि यह मंत्र जीवन की सभी बाधाओं को दूर करता है और भक्तों को सफलता और समृद्धि का आशीर्वाद देता है। जीवनसाथी के साथ संबंध सुधारने में भी यह मंत्र मददगार हो सकता है।
ऊं ह्रीं ग्रीं ह्रीं
आप भगवान गणेश की पूजा करते समय इस मंत्र का 108 जाप कर सकते हैं.
गणेश जी का शक्तिशाली मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
भगवान गणेश का यह मंत्र इतना चमत्कारी है कि इसके जाप से से जीवन में आने वाली सभी बाधाएं और परेशानियां दूर होती हैं।
भगवान गणेश को गुड़हल का लाल फूल विशेष रूप से प्रिय है। दूर्वा के साथ इस फूल को चढ़ाने से हर कामना शीघ्र पूरी होती है।

गणेश जी को कौन सा फल चढ़ाना चाहिए?
बेल - भगवान भोलेनाथ की तरह गणपति जी को भी बेल का फल बहुत पसंद है. मान्यता है गणेश चतुर्थी पर बेल का फल बप्पा को अर्पित करने से उनका विशेष वरदान प्राप्त होता है. अमरूद - गणेश स्थापन के समय पंच फल में अमरूद का भी विशेष स्थान है.

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 खाटूश्याम की पूजा करने से मनोकामनाएं होती हैं पूर्ण

यदि भक्त सच्ची आस्था, प्रेम-भाव से खाटूश्याम की पूजा-अर्चना करता है, तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. जिदंगी के सभी दुख-दर्द दूर होते हैं. हर कार्य सफल हो सकते हैं.खाटू श्याम में क्या मशहूर है?
खाटू श्याम बाबा को कैसे खुश करें?


खाटू श्याम जी की पूजा कैसे करें ...
श्री खाटू श्याम बाबा को चढ़ाए जाने वाला सबसे मुख्य प्रसाद कच्चा दूध है। यह बाबा को चढ़ाये जाने वाला पहला प्रसाद था, अतः यह बाबा को सबसे प्रिय है। इसलिए प्रयास करें कि कच्चे दूध का प्रसाद बाबा श्याम को अवश्य चढ़ाएं। खीर और चूरमा का भोग बाबा को प्रिय है।

यह मंदिर श्याम बाबा मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है और भव्यता के साथ साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण केंद्र है, श्याम बाबा जी को श्री कृष्ण जी के रूप में पूजा जाता है, खाटू में श्री कृष्ण जी का बहुत भव्य मंदिर है और इस मंदिर की प्रसिद्धि पूरे भारत देश में है, यहां पर सालाना लाखों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए |



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 मेहंदीपुर बालाजी जाने से क्या फायदा होता है?

मेहंदीपुर बालाजी के दर्शन मात्र से पूरी होती है मनोकामनाएं, बस गलती से भी न करें ये काम हनुमानजी को कलयुग का प्रधान देव कहा गया है। रामचरितमानस के अनुसार माता सीता ने उन्हें अजर-अमर का वरदान दिया हुआ है और इस बात की पुष्टि मेहंदीपुर धाम करता है। शास्त्रों में भी हनुमानजी के अमर होने के सबूत है।
मेहंदीपुर बालाजी का मंत्र
बार जाप करें। सकते हैं। “ऊँ नमो भगवते आत्र्जनेयाय महाबलाय स्वाहा।”
ओउम अस्य श्रीहनुमन्मंत्रस्य श्रीरामचंद्र: ऋषि:, गायत्री छंद:, श्रीहनुमान देवता, हं बीजं, नम: शकित: हनुमत्कीलकं, श्रीहनुमत्प्रीत्यर्थे जपेविनियोग:। ओउम हं हनुंमते नम:। द्विभुज स्वर्णवर्णानं रामसेवापरायणम।
इस मंदिर में भगवान हनुमान बाल रूप में मौजूद हैं. मेंहदीपुर बाला जी के समीप भगवान राम और माता सीता की मूर्ति है, जिसके हनुमान जी हमेशा दर्शन करते रहते हैं. 4. कहते हैं कि भूत-प्रेत की बाधाओं और नकारात्मकक बुराइयों से बचने के लिए प्रेतराज सरकार के दरबार में हर रोज 2 बजे कीर्तन होता है.

बालाजी और हनुमान में क्या अंतर है? बालाजी हनुमान का बाल रूप है जबकि हनुमान उनका प्रौढ़ावस्था रूप है। बालाजी स्वाभाव से बेहद चंचल और शरारती प्रवृति के माने जाते हैं जबकि हनुमान जी दृढ संकल्पित है जो अपने उद्देद्श्य को पूरा करने के बाद ही दम भरते हैं।

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